कोलोरेक्टल कैंसर को कोलोन या मलाशय का कैंसर कहा जाता है और साथ ही इसे कोलोन कैंसर या रेक्टल कैंसर भी कहा जाता है। यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि कैंसर की समस्या कहां उत्पन्न होती है, कोलन कैंसर और रेक्टल कैंसर को एक ही श्रेणी में रखा जाता है क्योंकि इनमें एक जैसी समस्या पाई जाती है, दरअसल कोलोन बड़ी आंत का ही हिस्सा होता है।

शरीर में कोलोन की लंबाई करीब 5 फिट तक होती है, जिसका कार्य मल से पानी को सोखने का होता है। रेक्टम कोलन का कार्य शरीर मे मल को स्थायी रूप से रखने का होता है जबतक की मल का त्याग ना हो जाए। भारत में कोलोरेक्टल कैंसर की शिकायत पश्चिमी देशों के मुकाबले कम है। मलाशय के कैंसर होने की औसतन आयु लगभग 40-50 वर्ष है।

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कोलोरेक्टल कैंसर के लक्षण शुरुआत में ही देखने को मिल जाते है। जिसमे रक्त का बहना, वजन का असमान्य रूप से कम होना, समय-समय पर थकान होना आदि शामिल है लेकिन इसके बाद के स्टेज में डायरिया, कब्ज ,दस्त उल्टी हमेशा देखने को मिलता है।

कोलोरेक्टल कैंसर के लक्षण (Colorectal cancer ke lakchan)

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ज्यादातर कोलोरेक्टल कैंसर कई वर्षों तक शरीर में धीमी गति से विकसित होते है। कोलोरेक्टल कैंसर का विकास ऊतक या ट्यूमर के रूप में कोलोन के हिस्से में होता है। पुरुषो के अपेक्षा महिलाओं में कोलोरेक्टल कैंसर की समस्या ज्यादा देखने को मिलता है।

1 तो आइए जनते है विस्तार से कोलोरेक्टल कैंसर के लक्षणों के बारे में ।

खाने की आदतों में बदलाव के कारण होता है कोलोरेक्टल कैंसर(khane ki aadat me badlaav ke karan hota hai colorectal cancer)

खाने की आदत में बदलाव कोलोरेक्टल कैंसर होने होने के सामान्य लक्षण में से एक है क्योंकि जब व्यक्ति अपने खाने पीने की आदत में बदलाव लाता है तब वह कभी कम या कभी ज्यादा खाता है लेकिन उसे हर समय यह महसूस होता है कि उसका पेट भरा हुआ है।

दस्त और कब्ज की समस्या

यदि किसी व्यक्ति को दस्त और कब्ज की समस्या हमेशा बनी रहती है तो ज्यादातर सम्भवना है कि उसे कोलोरेक्टल कैंसर हो सकता है।

स्टूल के रंग में परिवर्तन होना

कोलोरेक्टल कैंसर की समस्या होने पर स्टूल(stool) के रंग में परिवर्तन देखने को मिलता है, ऐसे में स्टूल का रंग कभी लाल कभी काला होता है।

स्टूल में खून आना

कोलोरेक्टल कैंसर की समस्या होने पर मल में खून आने लगता है लेकिन खून का रंग कभी लाल तो कभी काला हो सकता है।

पेट मे ऐठन की समस्या होना

पेट में दर्द का बना रहना,ऐठन की समस्या होना,पेट का डेली रूटीन में साफ न होना यह सभी कोलोरेक्टल कैंसर का एक कारण है।

असमान्य रुप से वजन में कमी होना

वजन में अचानक से कमी होना भी कोलोरेक्टल कैंसर का कारण हो सकता है।

थकान महसूस होना

व्यक्ति का हमेशा थका हुआ महसूस होना भी कोलोरेक्टल कैंसर का एक प्रमुख कारण है। ऐसे में व्यक्ति बहुत ज्यादा शारीरिक रूप से मेहनत ना करने के बाद भी थका हुआ महसूस करता है।

कोलोरेक्टल कैंसर से  बचाव कैसे करें (Colorectal cancer se bachav kaise kare)

कोलोरेक्टल कैंसर जैसी बीमारी से बचने के लिए बेहतरीन विकल्प है कि इसका समय समय पर जांच करवाते रहना चाहिए जांच की मदद से प्री कैंसर के ग्रोथ की जानकारी होती है जिससे कि उसमें कैंसर होने से पहले उसे निकाला जा सकता है। अमेरिका की कैंसर सोसायटी द्वारा यह सलाह दिया गया कि 50 वर्ष से अधिक उम्र के वयस्कों को कोलोरेक्टल कैंसर की जांच करा लेनी चाहिए। क्योंकि इनमें कोलोरेक्टल कैंसर होने की संभावना अधिक रहती है।कोलोरेक्टल कैंसर में स्क्रीनिंग की विधि

डिजिटल रेक्टल जांच 50 वर्ष से अधिक उम्र के वयस्कों को रेक्टल की जांच की शुरुआत कर देनी चाहिए साथ ही इसका जांच प्रतिवर्ष कर आना चाहिए ताकि आगे चलकर कोई समस्या उत्पन्न ना हो।

फेकल ओकल्ट ब्लड टेस्ट 50 वर्ष की उम्र के बाद हर वयस्कों को यह जांच अवश्य करा लेनी चाहिए।

सिग्मायडोस्कोपी यदि आप सिग्मायडोस्कोपी करवा रहे हैं तो साथ ही आपको 50 वर्ष की उम्र के बाद कोलनोस्कोपी भी करवाना आवश्यक होता है।

वर्चुअल कोलनोस्कोपी इस प्रकार की तकनीक में सी टी स्कैन का सहारा लिया जाता है। जिससे एक्स-रे की तुलना में तस्वीरें अधिक साफ दिखाई पड़ती हैं। यह विकल्प दूसरे स्क्रीनिंग के विकल्प से काफी अच्छा माना जाता है।

यदि आप कोलोरेक्टल कैंसर जैसी समस्या से बचना चाहते हैं तो इन सब तकनीकों को आप अवश्य ही अपना सकते हैं।

इसके अलावा और भी कई उपचार हैं जिसे अपनाकर आप कोलोरेक्टल कैंसर को सही कर सकते हैं। तो आइए जानते हैं इन उपचारों के बारे में।

  1. धूम्रपान अथवा शराब से बचाव
  2. रेड मीट के सेवन से बचें
  3. अत्यधिक सब्जियों फलों का सेवन करें जिनमें पर्याप्त मात्रा में फाइबर मिलता हो।

कोलोरेक्टल कैंसर के उपचार क्या है?(colorectal cancer ke upchar kya hai )

कोलोरेक्टल कैंसर

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कोलोरेक्टल कैंसर का उपचार रोगी के स्थितियों पर निर्भर करता है। जैसे- कैंसर से ग्रस्त भाग का आकार, कैंसर का स्थान, कैंसर की अवस्था और रोगी की शारीरिक स्थिति का आकलन किया जाता है। चिकित्सकों के द्वारा कोलोरेक्टल कैंसर का उपचार कई तरीको किया जाता है। जैसे- कीमोथेरेपी रेडियोथेरेपी एवं टारगेट थेरेपी आदि की मदद ली जाती है।

कोलोरेक्टल कैंसर के उपचार की प्रमुख विधि सर्जरी है अर्थात सर्जरी के बाद ही अन्य कीमोथेरेपी रेडियोथेरेपी एवं टारगेट थेरेपी की सहायता ली जाती हैं लेकिन सर्जरी की आवश्यकता रोगी के बीमारी की स्थिति को देखकर की जाती है। इसका इलाज तो संभव है लेकिन इसके लक्षणों का पता चलते ही आपको जल्द ही डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

कोलेक्टरल कैंसर किन्हें हो सकता है? (Colorectal cancer kinhe ho sakta hai?)

  1. हर 20 में से एक व्यक्ति को कोलोरेक्टल कैंसर होने की संभावना हो सकती है।
  2. व्यक्ति की उम्र जैसे-जैसे बढ़ती है वैसे वैसे ही कोलोरेक्टल कैंसर होने की संभावना बढ़ जाती है।
  3. कम समय ने यदि इस बीमारी का पता चल जाए तो इसका इलाज संभव है।
  4. यदि घर के किसी भी सदस्य को कोलेस्ट्रोल कैंसर हुआ है तो किसी और सदस्य को होने की संभावना बढ़ जाती है।
  5. जो व्यक्ति धूम्रपान और शराब का सेवन नियमित रूप से करता है उसे कोलेस्ट्रोल कैंसर होने की संभावना बढ़ जाती है।

हमने आपको इस आर्टिकल के माध्यम से कोलोरेक्टल कैंसर के बारे में जानकारी दी और बताया की कोलोरेक्टल कैंसर क्या होता है? और कोलोरेक्टल कैंसर होने के क्या क्या लक्षण हैं? इसके साथ ही हमने आपको कोलोरेक्टल कैंसर के उपचार के विषय में भी जानकारी की किन किन परिस्थितियों में आप कोलोरेक्टल कैंसर का उपचार करा सकते हैं। इसके साथ ही हमने आपको यह भी बताया किस परिस्थिति में कोलोरेक्टल कैंसर होने की संभावना बढ़ जाती है।

हमें उम्मीद है कि हमारे द्वारा लिखा हुआ कोलोरेक्टल कैंसर पर लेख आपको पसंद आया होगा यदि इसके बाद भी इस लेख से संबंधित आपके मन में कोई प्रश्न उत्पन्न हो रहा है तो आप अवश्य ही हमें कमेंट बॉक्स में बताएं।

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धन्यवाद।